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श्री गोपाल कृष्ण गाँधी। का भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के स्थापना दिवस पर अभिभाषण |
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माननीय अध्यक्ष डॉ.अनिल काकोडकर, माननीय निदेशक प्रा.खख्खर,माननीय प्रा. सुखात्मे, प्रा.कॉन्ट्रेक्टर, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के संकाय, भूतपूर्व छात्र, एवं विशिष्ट अतिथिगण, पुरस्कार विजेतागण एवं इनके परिवार के सदस्य।,
इस वर्ष स्थापना दिवस पर मुझे अभिभाषण देने का अनुरोध कर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई ने जो अति उदारता दिखाई है उसके लिए मैं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई को धन्यवाद देता हूँ।
और मेरे लिए अगला 15 मिनट चुनौतिपूर्ण हैं, साथ ही संभाषण में संक्षिप्ता, चिंतन में स्पष्टता एवं अभिव्यक्ति में सहजता के दुर्लभ वरदान प्राप्त हो जाए। स्थापना दिवस दिन या दिनों के संबंध में नहीं होता है;यह बुनियाद के विषय में होता है। यह शिलान्यास करने, शुभारंभ करने एवं कार्य प्रारंभ करने के बारे में होता है। यह इसकी स्थापना विषय में, जमीनी कार्य के विषय में होता है। यह सब उसी के बारे में है जिसे हम हिंदुस्तानी में बुनियाद कहते हैं। अतः भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान का स्थापना दिवस बुनियादी भाव में प्रौद्योगिकी एवं इसके अनुप्रयोग के विषय में चिंतन को स्पंदित करेगा। प्रौद्योगिकी शब्द का जब भी हम उपयोग करते हैं तब हम कुछ ऐसी चीजों के विषय में सोंचते हैं जो नाजुक हो, यहां तक वह यांत्रिकी हो, कुछ ऐसी चीज जो भारी हो, जिसकी संस्थापना हो सके। अगर हम इस पर चिंतन करें तो यह उतना ही अतिसूक्ष्म , नाज़ुक, नश्वर, मानव मन की रचना है जितना की मानव का चिंतन। एक चिंतन के रूप में मानव मन में उठता है, एक चिंतन के रूप में प्रौद्योगिकी प्रक्रियाएं शुरु होती हैं, वस्तुतः यह मात्र एक चिंतन होती है। भौतिक रूप में संविरचन प्रक्रिया एवंं अनुप्रयोग के लिए विचारों का संचयन होता है, जब यह निरूपण से संविरचना के परे जाता है तो यह सूक्ष्म प्रौद्योगिकी बन जाता है। हमें यह स्मरण रखना होगा कि मूर्त प्रौद्योगिकी के पार्श्व में तन्य प्रौद्योगिकी होती है जो सुनम्य होती है जो आकार को बदल सकती है- अपना भी और अपने प्रसंग का भी। अतः मूल में प्रौद्योगिकियाँ चिंतन है जो संरचना देती है और पुनः संरचना एवं आकार बनाने के लिए एक आरूप बनाती है। और वहीं एक चिंतन व चिंतन धारा को मूर्त रूप मिलता है, प्रौद्योगिकी चिंतन की प्रभुसत्ता में रहती है जो कि दर्शन व भाषाविज्ञान व तर्कशास्त्र से कम नहीं है। चिंतन की दुनिया में इसका विशेष परिवार विचारों का परिवार होता है और जो समाधान के विचार हैं वस्तुतःवही समाधान हैं। प्रौद्योगिकी विचार एक समस्या से उद्वेलित होता है जो समाधान चाहता है। तथाकथित समस्या कल्पना जगत में होती है अथवा वास्तविक जीवन की समस्या से संबंध रखती है। यह जैसी भी हो प्रौद्योगिकी मौलिक रूप से समस्या से जुझता एक मस्तिष्क है जो समाधान चाहता है, प्रौद्योगिकी समाधान चाहता है और एक नया विचार के साथ आता है। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रौद्योगिकी का विकास न केवल परिष्करण का संकलन है अपितु लोकाचार भी है। इसमें जितना अभिकल्प है उतना ही लोकाचार भी है और उस अभिकल्प की उपयोगिता भी है। यह निदान विचारों के एक स्टेशन से शुरु होकर कई स्टेशनों के गुजरती है जैसी की रेल गाड़ी चर्चगेट से विरार तक जाने में मेरिनलाइन्स, चर्नीरोड, ग्रांट रोड, मुंबई सेंट्रल, महालक्ष्मी, लोअर परेल, एलिफिस्टन रोड, दादर, इसी तरह कई स्टेशनों से गुजरती है। ये स्टेशन तकनीकी स्टेशनों के मार्ग हैं, इसमें विचार स्थायित्व, वांछनीयता, दायित्व, व्यवहारिकता, संभाव्यता,व्यवहार्यता, उपयुक्तता, वहनीयता, शक्यता जैसे विचारों के बीचवाले स्टेशनों से गुजरता हुआ विरार स्टेशन पहुँचने के समान वास्तविकता नामक अंतिम पड़ाव पर यात्रा को पूर्ण कर लेता है। यह अंतिम पड़ाव ही जो कभी खुशी कभी गम लाता है। मैं सुझाव देना चाहूँगा कि प्रौद्योगिकी आंतरिक मंथन के लिए अपनी प्रकृति का परीक्षण करे जो इसे शब्द से बहुत कुछ ज्यादा देती, इसकी आवाज देती, ऐसा लगता है कि इसमें बहुत कमी है। वह प्रकृति जो निगरानी करती है, वह आवाज जो प्रश्न करती हैः भारत द्वारा प्रारंभ की गई बृहद प्रौद्योगिकी यात्रा को एक साथ करना है, वह बड़ा पड़ाव जहाँ वे पहुँच गए हैं? क्या वह निदान-विचार जिस पर भारत की निर्मुक्त यात्रा शुरु हुई है अपने गंतव्य तक पहुँच गई है। हमारी ये उपलब्धियाँ सभी को देखना चाहिए है। हमारे अंतरिक्ष परीक्षण में प्राप्त ऊचाई से भी अधिक ऊचा, समुद्री तल में की गई खुदाई भी अधिक गहरा, अंटार्टिका में हमारी स्टेशन की पहुँच से भी अधिक चौड़ी, हमारी प्रौद्योगिकी उपलब्धियों की चमक है। इनमें से बहुत सारी पूर्णतः हमारी अपनी है, इसकी अवधारणा और शिल्प हमने बनाई है, भारतीय मस्तिष्क से, भारतीय हांथों से, भारी अड़चनो के सामने, यब एक अभिमान की बात है। हमारे उपग्रहों से संचार हमें अपनी खेती और मत्स्य पालन के लिए मार्गदर्शन करता है। जटिल रूप से जुड़ा मोबाइल टेलिफोन के माध्य से हम एक दूसरे से सम्पर्क में रहते हैं, यह हमें माइक्रोचिप,अर्ध चालक एवं लैबटॉप तक ले जाता है- वे भी हमारे लिए मानवीय समाज को इतना जटिल बना दिया है जितना कोई अन्य प्रौद्योगिकी नहीं - यह आश्चर्यों में भी आश्चर्य है। हमारी मृत्यु दर तेजी से कम हो गई है इसके कारण जन्म के समय से जीवनकाल लम्बा हो गया है। ये अज्ञानता और निरक्षरता जिसके कारण प्राचीन भारत में सभी जगह अंधविश्वास और विकृति फैल गई थी से पार पाने के हथियार हैं और हमारे युवा मन पर लेप लगा रहे हैं। इन सब उल्लेखनीय उपलब्धियों के पीछे के उपक्रम में प्रौद्योगिकी सहारा होने के कारण यह कोई छोटा कदम नहीं है। वे विनिर्माण करनेवाले व्यापारी, सामानों को एवं सेवाओं को परिवहन करनेवाले गाड़ियों के लिए सड़के कभी आराम नहीं करती, वह युद्ध - हमारे लिए निंदनीय, दुःखदायक, अनचाहा है जब हम पर थोप दी जाती है, तब हम नापाक इरादों को रोकने के लिए अपने हथियार उठाने में समर्थ होते, मरूस्थल, पहाड़ों, दलदल जमीन एवं समुद्र तक अपनी आत्म रक्षा के लिए परिवहन के साधन को अपनाते हैं, इसके मूल रूप में राष्ट्रीय आकांक्षा में सहायता के लिए प्रौद्योगिकी का जय होता है। वह प्राचीन चक्र, महान अशोक का धर्मचक्र अब साधुता साथ ही साथ लोगों की भौतिक प्रगति का प्रतीक है क्योंकि भारत की बुद्धिमत्ता भारत के उपक्रम से, भारत की वीरता, भारत के कौशल से बनी है। फिर भी इस कहानी में कुछ तो कमी है। कुछ तो है जो कि वास्तविकता है, गलत है, भयानक रूप से गलत है। यदि इसमें कुछ गड़बड़ी नहीं है, तो क्या हमारे शहरे उतने गंदे होते जितना हैं, क्यों यह कोहरे और कालिक से भरा शमशान घाट या शमशान भूमि की तरह उदास, विलाप करता हुआ दिखता। सभी के लिए खुला हुआ किंतु कुछ के लिए बंद उस बड़े शौचालय की तरह दुर्गंध फैलाता। यदि इसमें कहीं कुछ कमी नहीं तो क्यों हमारे शहर, उपनगर, एवं नगर प्रदूषित, बदबूदार, शोर से गुंंजते हुए अपक्षय होते सिमेंट का व्याधिजनक अम्बार, जंग लगते लोहे , ग्रीजलगे कांच से भरे पड़े शहर हैं। अपनी ही भीड़ से क्लांत होकर निस्तेज होती हवाएं, कचड़े से उत्सर्जन से उनके संदूषित जल, बेलगाम छोड़े गए, परित्यक्त, बेकार पड़े मलवे से अवरूद्ध गलियाँ। यदि कुछ गड़बड़ियाँ थीं तो क्या शहरों से निकलनेवाली कचड़ों को निर्लजता से सनकी होकर नगरपालिका सीमा से आगे जहां शहरी भारत समाप्त होता है और ग्रामीण भारत शुरु होता है वहाँ फेंका जाता? इसमें कहीं कुछ गलती नहीं होती तो क्यों बेघर लोग निराश होकर वाहनों के लिए बने फ्लाईओवर के नीचे रहते। कहीं कोई गलती नहीं है तो क्यों सड़कों के परिदृश्य में दिन दुगनी रात चौगुनी परिवर्तन हुआ है लेकिन इसमें दूसरी बिडम्बना भी है जैसे कि पैदल चलने भारतीय-जिनकी संख्या बड़ी होती है-वाहन से हटकर निकलवाले, दबकर, गुड़कते हुए, अपने आप सिकोड़ते हुए आगे बढ़ते हैं, रुकते है, विराम लेते हैं, और पुनः चलने लगते हैं और साँय-साँय कर एक पहिया, दो पहिया, तिपहिया और चौपहिया बाहन एक के बाद निकल जाने पर ही धक्कम-धक्का करते हुए तब तक रुकते हैं जब तक कि आपको रास्ता साफ़ नहीं मिल जाता है। और आप फिर आगे बढ़ते हैं अचानक दूसरी गाड़ी आपके सामने से निकल जाती है जैसे आपका का कोई मायने नहीं या आपकी कृति भूल से हो गई हो। नार्वे में जहांँ कि राजतंत्र है वहां राजा प्रायः पैदल चलनेवाले होते हैं अपितु पैदल चलनेवाला हमेशा राजा होता है। प्रजातंत्र भारत में , जो राजा के बराबर हैं राहों पर उनका ही अधिकार है और पैदल चलने वालों को किस्मत पर। यदि कहीं कुछ विसंगति नहीं होती क्यो प्रौद्योगिकी प्रेरित हमारी हरित क्रांति की महान सफलता मेंं भी हर पैतींसवें मिनट में कृषि संकट के कारण किसानों की आत्म हत्या करने की बिडम्वना होती। यदि कहीं कुछ असंगति नहीं है तो क्यों प्रौद्योगिकी आधारित विकास मॉडेल धरती में हो रहे गैर कानूनी उत्खनन के कारण ग्रामीण क्षेत्र के खतरे का असहाय सा तमाशबीन बनी हुई है वहीं माफिया मालामाल हो रहे हैं, गैर कानूनी तरीके के कटते वृक्ष जिससे आधिवासियों के हक छिन जाता है और वे निर्धन हो रहे है, वही ठेकेदार और डेवेलपर मालामाल हो रहे, और लोग अपनी पैतृरिक संपत्ति से वंचित होकर नक्सनी हिंसा एवं प्रतिहिंसा को आपना रहे हैं। यहीं पर लोकाचार, मूल, उत्पति, प्रौद्योगिकी अवधारणा की बुनियाद होती । यहीं पर प्रौद्योगिकी की आवाज होती है, प्रौद्योगिकी को आदर्श के रूप में दिखना चाहिए न कि केवल प्रौद्योगिकी के आधार पर। लम्बे समय से प्रौद्योगिकी को मात्र एक उपकरण माना जाता रहा है। क्या यही बात है, निश्चय ही, लेकिन यह इससे भी कुछ ज्यादा है। यह एक मनोवृति है, एक दृष्टिकोण है, एक मार्ग है जिसके विकल्प हैं, कम करने एवं निर्मूलन पर यह परिचर्चा करती है, अपने में संयोजन करती है, अपना मूल्यांकन करती है और पृथक होकर नहीं अपितु प्रसांगिक होकर। प्रौद्योगिकीविद् कोई खानसामाँ नहीं होता जो आगामी भोजन के लिए व्यंजनों की सूची बना रहा हो; प्रौद्योगिकीविद् अभियांत्रिकी विधि, वैज्ञानिक विकल्प तथा प्रयोग एवं प्रसांगिक बुद्धि से विकसित पदार्थों के निर्माण के प्रयोगाश्रित अवसर के भण्डार हैं। प्रौद्योगिकीविद कोई माली नहीं है जो मौसम के अनुसार मालिक के पसंद के फूलों का इंतेजार कर रहा है; प्रौद्योगिकीविद मिट्टी और मौसम को जाननेवाला बागवान है, वृक्षशास्त्री माली है, पुष्पशास्त्र का विशेषज्ञ है, जो बादलों और जलवायु को पढ़ सकता है, किस पौधे और कब लगाना चाहिए या नहीं लगाना चाहिए, किसी पौधे को निकाल देना चाहिए, पौधे को किस स्थान पर लगाना चाहिए, दो पौधों के जड़ो के बीच कितनी दूरी होना चाहिए, और वह जानता है कि इस भू-भाग के ऊपर में और जमीन में क्या है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रौद्योगिकीविद् शासन या निगमों के दरबारी नहीं, बल्कि परामर्शदाता हैं। प्रौद्योगिकीविद् आदेशों को यंत्रवत लागू करनेवाला नहीं होता, उसे योजना बनाने में सहभागी होना होगा। इसका अर्थ यह है कि प्रौद्योगिकीविद् को अनवरत मात्र प्रौद्योगिकी परिदृश्य पर ही नहीं अपितु मानव की अवस्था पर अविरत नज़र रखना होगा। एक प्रौद्योगिकीविद को यह बात बिलकुल नहीं भूलनी चाहिए कि जितनी तेजी से प्रकृति भू-जल की आपूर्ति करती है इससे भी अधिक तेजी से प्रौद्योगिकी भू-जल को निकाल रहा है। एक प्रौद्योगिकीविद् को यह बात भूलने का दुःसाहस नहीं करना चाहिए कि नीचे जल तेजी से कम हो रहा है और ऊपर कचड़ा बढ़ता जा रहा है। एक राष्ट्र के रूप में हमारा दम घुटने लागा है। डेनमार्क मूल के मेरे एक मेरे प्रिय मित्र , लेडविग पेश ने कर्नाटक संगीत का गहन अध्ययन किया है। वे भारत नियमित रूप से आते रहते हैं। हाल ही में अपनी यात्रा समाप्ति पर मुझे निम्नलिखित रूप में मेल कियाः "भ्रमणकारियों और रहिवासियों दोनों को एक समान वास्तविक खतरा निश्चय ही उपभोगताओं के व्यवाहर और सरकारी अनदेखी के कारण निरंतर बढ़ते प्रदूषण से हैः भ्रमण के समय अनुभव किया कि पतन का कोई अंत नहीं, दहकते कचरे के अम्बार से गहरा कोहरा बनाता प्लास्टिक का धूँआ। तीन घंटे की यात्रा के बाद सोंचने लगा " भगवान का यह कौन सा देश हो सकता है" यह विकास दुःखी करनेवाला है क्योंकि इससे बचा जा सकता है । इसे कम करने व अपशिष्ट को संसाधित कर तथा संबंधित आचरण से जैसे कि थोड़ी पर्यावरण शिक्षा, से इसमें सुधार किया जा सकता है।" (Unquote). जो एक साधारण व्यक्ति के लिए सुगंध या सौंदर्य दृश्य का विषय है, जरूरी नहीं कि वही प्रौद्योगिकीविद् के लिए हो। जिस जगह हम कचड़ा जमा करते हैं और बम्बावाले से जो पानी खरीदते हैं, या सुन्दर सी काली बोतल की बनाई गई शराब जो हम बैठकर पीते हैं वह किस जलाशय से और किस जगह से लिया गया है इसका क्या और कितना अनुषंगी परिणाम है वह वास्तव केवल एक प्रौद्योगिकीविद् ही जानता है। दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा हाल ही में किए गए अध्ययन यह दिखाता है कि दक्षिण-पश्चिम, उतर और बाहरी दिल्ली का पानी एक ओर पूर्णतः घुला हुआ ठोस पदार्थ, फ्लोराइड, एवं नाइट्रेड दूसरी ओर पानी का खतरनाक कॉकटेल (मिश्रण) है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की निर्धारित सीमा 1.5 पीपीएम की जगह भू-जल में 11.6 पीपीएम है। नाइट्रेड संदूषण के बारे में तो पूछिए मतः विश्वस्वास्थ्य संगठन का मानक 45 पीपीएम है- नजाफ़गढ़ में 138.21 पीपीएम। ब्लू बेबी सिंड्रोम सीधे नाइट्रेड विषाक्ता से जुड़ा है।
पशुओं से जनित महामारी जिससे हम प्रभावित हुए हैं, के लिए पूर्वी एशिया को दोष दे सकते हैं, विक्टॉरो , पंछियों, मुर्गियों , मवेशियों और स्वाइन को विशेषकर हम में जो निर्बल है को दोष दे सकते हैं। हम ने जो प्रकोप देखा है वह हमें बहुत बार प्रभावित कर सकता है, लेकिन वे केवल प्रौद्योगिकीविद् ही हैं जो हमें अपनी विशेषज्ञता के बल पर चेतावनी दे सकते हैं कि हमारी जीवन शैली और कार्य शैली, विनिर्माण शैली और इसके गौण प्रभाव, इसके उपफल और इनके परिणामों पर कम ध्यान दे रहे हैं और हमारी अपनी दर्जा व नगर अनुरक्षण में कमी है जो विश्व हमें नाली से बहते गंदे पानी का चैम्पियन, दुर्गंध का चैम्पियन बना रहा है आशाओं पर खड़े उतरने के लिए नहीं बल्कि इसके बिपरित संकट की ओर बढ़ रहे हैं।
मुझे एक और अप्रिय संदेश का वाहक बनकर कहने दें जिसे केवल प्रौद्योगिकी ही पुष्टि कर सकती है जैसा कि हमारी वर्तमान अवस्था में हृदयहीनता है, यह मात्र समय की बात है कि प्राचीन अभिशाप, प्लेग हमारे शहरों में फैला। हमें यह न भूलना चाहिए कि 1990 के अंतिम समय में गुजरात में सूरत उस भयावह बीमारी से विनष्ट चुका था। केवल दृढ़संकल्प जिलाधीश की सरल हृदयता ने काल से बचाया । हम जो सुपर पॉवर बनने की अभिलाषा कर रहे हैं , और ऐसा होता है तो , इसमें कुछ सहायता मिलती है तो जान लें कि हमें एक सुपर बनाया जाना एक कच्चा नुख्सा है, हमें सुपर पॉवर होना चाहिए एक विद्यालय शिशु की आकांक्षा वाली बात है। जंगल पुस्तक के सपने में यदि बे एशिया के बाघ है तो हम एशिया का केवल एक हाथी हैं। नहीं महोदय व नहीं महोदया कहने में प्रौद्योगिकीविद् को सक्षम होना चाहिए, हमारा लक्ष्य हस्ति पर नहीं अपितु वस्तुस्थिति पर , शक्ति पर नहीं बल्कि समझदारी पर, दौर में किसी से आगे निकलने पर नहीं बल्कि बल्कि अपनी सही गति पर होना चाहिए।
भले ही हम 10% की वृद्दि दर, 15 को दुगना, यहां तक कि पंद्रह का पंद्रहगुणा, नैनो की शक्ति को लघु रूप देना, फाइबर ऑप्टिक्स की क्षमता को अधिकतम बनाना, बैगन की जेनेटिक्स में सुधार की प्रवीणता पर आज खुशियाँ मना सकते हैं -, कल की ऊर्जा के लिए मूल्यावान अंश लाने समुद्र की सतह में गुरूवाकर्षण सहायित गोता लगाने की योजना बना सकते हैं, गुरुत्वाकर्षण के विपरीत अंतरिक्ष में गरजते हुए मानव सहित चाँद पर उतर सकते हैं और इससे भी अधिक दुशप्राप्य संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थान पाना, सुपर पॉवर बनने की हमारी इच्छा ये सभी प्राप्त हो जाने पर यह कोई मायन नहीं रखता जब कल्पना से भी अधिक भारत की आधी जनसंख्या बेदखली का सामना कर रही हैं, पैतृक संपत्ति से वंचित हो रही हैं, विस्थापित हो रही हैं, धीरज से भी अधिक विपत्ति मेंं है, इसके साथ ही ऐसे शहर बना रहे हैं जो शक्तविहीन, रक्षारहित, बुद्धिहीन, और बिना आवाज़ की है, किसी हथियार से लैस दुश्मन की सेना के सामने नहीं बल्कि सड़न से फैलती दुर्गंध और मानव के अपने ही कचड़े के धब्बे सामने और विकास ने जो मोड़ लिया है इसके विरोधाभास के सामने ? अतः प्रौद्योगिकीविद मान ले कि राष्ट्र की नियति के लिए बृहतर और समुचित प्रौद्योगिकी को कैसे अपनाएंगे? मैं सुझाव देना चाहूँगा कि वे ऐसा मैदान में दावा मारकर नहीं, अपनी कार्य सीमा से चिपकर नहीं करे बल्कि सार्वजनिक उचित कारण से हस्तक्षेप करें। उनके पास प्रफुल्ल चंद्रराय. मेघनाथ साहा, सी.वी. रमण और श्री विश्वेश्वरैया के उदाहरण हैं। मैं सुझाव देना चाहूँगा कि वे ऐसा मैदान में दावा मारकर नहीं, अपनी कार्य सीमा से चिपकर नहीं करे बल्कि सार्वजनिक उचित कारण से हस्तक्षेप करें। उनके पास प्रफुल्ल चंद्रराय. मेघनाथ साहा, सी.वी. रमण और श्री विश्वेश्वरैया के उदाहरण हैं।मैं सुझाव देना चाहूँगा कि वे ऐसा मैदान में दावा मारकर नहीं, अपनी कार्य सीमा से चिपकर नहीं करे बल्कि सार्वजनिक उचित कारण से हस्तक्षेप करें। उनके पास प्रफुल्ल चंद्रराय. मेघनाथ साहा, सी.वी. रमण और श्री विश्वेश्वरैया के उदाहरण हैं।
प्रख्यात खगोल-भौतिकविद और ग्रेटब्रिटेन में राजकीय खगोलशास्त्री, लॉर्ड मार्टिन रीज ने एक अत्युत्तम पुस्तक 'फाइनल सेंचुरी' लिखी है। यह पुस्तक हर उस व्यक्ति को अवश्य पढ़ना चाहिए जो पृथ्वी ग्रह के विषय में सोंचते हैं। वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों को तो इसे जरूर पढ़ना चाहिए। इसमें उन्होंने कहा है , जैसा कि हम इसे और इसकी सभ्यता को जानते हैं इस सदी में जीवित रहने का आधी-आधी उम्मीद है। पृथ्वी का उल्का पींड से टकराने की सदैव बनी हुई संभावना के अलावा मानवीय त्रुटियाँ, आतंक, गलत अंदाज एवं गलत बर्ताव, जीवित रहने की आशाओं के मुख्य शत्रु हैं। वे एक वैज्ञानिक, प्रौद्यिगिकीविद, मानिविकीविद के रूप में मानव से बात कर रहे हैं। वे मुझे स्मरण दिलाते हैं कि बर्टेन रस्सेल जैसा कोई भी अनोखा दर्शनशास्त्री -भौतिकविद नहीं हुआ है।
यदि हमें मार्टिन रीस चेतावनी दे सकते हैं, पुगवास वैज्ञानिक चेतावनी दे सकते हैं, तो हमारे वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीविद ऐसा क्यों नहीं और इससे भी अच्छा क्यों नहीं कर सकते हैं। वे दुर्भाग्यशाली हैं कि उनसे केवल हर्ष और सफलता की कहानी लिखने के लिए कहा जा रहा है। जब ऐसा नहीं कर पाते हैं तो खामोश रहते हैं जैसे कि कोई व्यक्ति खामोश रहने का कसम खा लेता है। हम उनसे कड़वा सत्य या जो समाज में परिवर्तन लाने के लिए जरूरी है उस नुख्से के विषय में उनसे सुनना नहीं चाहते हैं। यह नहीं हो सकता कि समाज आलस्य में पड़ा रहे और केवल प्रौद्योगिकी ही चलती रहे, प्रयोगशालाओं, परीक्षण स्थलों पर, विमोचन स्थलों पर वस्तुओं को हिलोड़ित करती रहे। यह नहीं हो सकता कि प्रदूषकों और प्रदूषणमुक्त करनेवाले पर्यावरणविदों से प्रौद्योगिकी से ही सम्बद्ध रहे। आक्सिजन जितना विज्ञान के लिए जरूरी है उतना ही जीवन के लिए भी।
दो विशेष क्षेत्र हैं जहाँ पर प्रौद्योगिकी जगत के समाचार को स्वागत किया जाएगा। पहला है सौर ऊर्जा जनन, भण्डारण, वितरण तथा इसी तरह विलवणीकरण प्रक्रिया में आनेवाली लागत को कम करना- जो कि दो भूमण्डीय आवश्यकता है। यह नहीं हो सकता कि प्रकृति ने हमें जो प्रचुर मात्रा में दी है - प्रकाश और पानी - वह भी महँगी हो। दूसरा कचरा, विशेषकर ई कचरा एवं प्लास्टिक कचरा, जलीय परियोजनाओं से कीचड़ के रूप निकलनेवाला अपशिष्ट, विलवणकीकरण संयंत्रों से निकलेवाला लवण जल, सबसे अहम कचड़ा नाभिकीय अपशिष्ट जो जब हम नाभिकीय ऊर्जा का उपयोग करने लगेंगे तो और भी अधिक निकलेगा, के निपटान और इसके अपक्षय के लिए एक बौद्धिक एवं सुरक्षित प्रणाली भारतीय प्रौद्योगिकी को दिखाना होगा। बहुत लम्बे समय तक विज्ञान को सृष्टिकर्ता ब्रह्मा और विनाशकर्ता शिव की भूमिका अदा करने के लिए विज्ञान को कहा गया है। अब समय आ गया है कि विष्णु की तरह यह पालनहार बने। अब समय आ गया है न केवल भारत सुरक्षित बने अपितु मानवता की बुनियाद सुरक्षित बने।
मैं प्रार्थनायुक्त अनुरोध से समाप्त करना चाहूँगा। केवल तथा कथित ग्रीन इसके विषय में व्याख्यन देते रहे तो कोई भी जलवायु परिवर्तन के खतरे को भी गंभीरता से नहीं लेगा। हां यदि आप में से कोई इस खतरे को देखता है तो उन्हें इस पर साफ़ तौर अवश्य बोलना चाहिए। यह आप ही है जिनके पास ज्ञान का परिक्षेत्र है, अन्य के पास केवल उत्कंठा है। इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है कि स्थायी तुषार भूमि (पर्माफ्रोस्ट)) पिघलने लगा है. अंटार्टिका कम ठंडा होने लगा है। इसे कोई इंकार नहीं कर सकता कि मौनसून अनियमित हो गया है। वर्षा न होने से, अनावृष्टि के बाद सूखा पड़ने पर हमें स्नान करने के तरीके में परिवर्तन करना पड़ सकता है, दिन में दो बार स्नान करने की जगह दो दिन में एक बार स्नान करना पड़ेगा, बोतल का पानी जो धनिकों के लिए 10 से 12 रु में मिलता है,रू 100 में हो जाएगा। पानी के लिए दंगें जैसा कि बोलिबिया में हुआ था शुरु हो जाएंगे, जब औसत समुद्र स्तर मालद्वीप के साथ-साथ अपने लक्ष्यद्वीप और अन्य समुद्र तटीय क्षेत्र में उठने लगेगा, सुंदरवन में ज्वार बढ़ने लगेंगे तब हम जलवायु शरणार्थी देखेंगे जो हमारे 1971 के अनुभवों का पुनरावृति होगा। सीमित संसाधनों के अपव्ययी एवं शोषक इसका हिसाब रखने लगेंगे। यही कार्य नीति निर्धारक करेंगे और प्रौद्योगिकीविद भी करेंगे। जल विज्ञानी, भूविज्ञानी, जलवायु विज्ञानी यह प्रश्न करेंगे कि उन्होंने अपव्ययी मानव को समय रहते ही क्यों नहीं चेताया। मैं इस चिंतन समाप्त करता हूँ कि प्रौद्योगिकी शुरु हुई है साथी चिंतन भी। साधारण चिंतन नहीं बल्कि वह चिंतन जो सपना और दुःस्वप्न में फर्क बताए। एक को सच में बदले और दूसरे को दूर करे।
गोपाल कृष्ण गाँधी।
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